Wednesday, 18 May 2011

इस रात की सुबह नहीं|



काँच से छनी चाँदनी भी
धूप से कुछ कम नहीं,
थके हुए मन की चंचलता को
रात के सुकून में भी चैन नहीं,
निश्चिंत नींद के वायदे में भी
इन बंद आँखों में नींद नहीं,
इस रात की सुबह नहीं|


सपनों के आँगन में सोते इस दिल को
थी कुछ और की जरूरत नहीं,
पर असलियत की झाँकी देखी
और अब इन सपनों में रंग नहीं,
और अब हकीकत की चाह में
इस दिल को झूठे दिलासे मंजूर नहीं,
इस रात की सुबह नहीं|


ठहराव के इंतेजार में
चंचल मन को चैन नहीं,
दिनभर के शोर के सिवा
दिल को कहीं और आराम नहीं,
और इसी शोर के बीच होगा 
इस इंतेजार का अंत कहीं,
इस रात की सुबह नहीं|


2 comments:

dev said...

wow...restlessness...a beautiful way to capture and show the emotion...simply wow...i tried a sketch on the same theme but ended up in scribbles...this is really nice :)

Devansh Gupta said...

Thanks Dev!
Send me the sketches sometime yaar...